Tuesday, September 7, 2021

12 Best Moral Stories in Hindi 2021 for Kids | नैतिक हिंदी कहानियाँ बच्चों के लिए

Moral Story In Hindi

Moral Stories in Hindi for Kids
Moral Stories in Hindi for Kids

12 Best Moral Stories in Hindi for Kids


इस लेख में हम आपको Moral stories in Hindi के बारे में बताने वाले है। इन कहानियों को आपने बचपन में अपने दादा दादी से सुना होगा। यह कहानियाँ बहुत ही ज्ञानवर्धक और शिक्षावर्धक है। इन नैतिक हिंदी कहानियाँ से आप बहुत सारी अच्छी बात सीखेंगे। जिनको आप अपनी जीवन में प्रयोग करके सफलता पा सकते है। यह कहानियाँ बहुत ही रोचक है। जिनको पढ़कर आपको और बच्चों को बहुत आनंद आएगा। इनमे कुछ New moral short stories in Hindi 2021 दी गयी है। जिससे आपको नयापन का अनुभव हो। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़ कर बोर हो गए है तो। यहाँ पर हम आपको सबसे अच्छी 12 Moral stories in Hindi for kids दे रहे है।
 

1. Moral Stories in Hindi - एक मूर्ख कंजूस 


किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसके पास बहुत धन था। कंजूस वह इतना था कि हमेशा बिना नमक के सत्तू खाया करता था। किसी स्वादिष्ट भोजन का स्वाद कैसा होता है यह वह नहीं जानता था। 
लेकिन एक दिन पता नहीं क्या हुआ, उसने अपनी पत्नी से कहा आज मेरा मन खीर खाने को कर रहा है। 


पत्नी को अचरज तो हुआ लेकिन उसने तुरंत खीर बनाकर तैयार कर दिया। उसका मन भी तो खाने को कर रहा था न। 

लेकिन उस मुर्ख कंजूस को इस बात का डर था कि कही कोई आ ना जाये इसलिए वो घर के अंदर छिपकर बैठ गया। 

संयोग से तभी उसका मित्र उससे मिलने के लिए आया। उसकी पत्नी से पूछा तुम्हारे पति कहाँ है। 

पत्नी ने अंदर जाकर अपने पति से कहा, आपका मित्र आपसे मिलने आया है। 

वह कंजूस यह सुनकर घबरा गया। उसने अपनी पत्नी से कहा, में लेट हूँ। तुम मेरे पांव पकड़कर जोर से रोना शुरू कर दो। तुम्हारे रोने की आवाज सुनकर वह अंदर आ जायेगा फिर तुमसे कुछ पूछेगा। तुम कह देना की मेरे पति मर गए। यह सुनकर वह चला जायेगा। उसके जाने के बाद हम दोनों मिलकर खीर खाएंगे। 

पत्नी ने ऐसा ही किया। वह पति के पैर पकड़ कर जोर-जोर से रोने लगी। मित्र ने अंदर आकर पूछा, क्या बात है ? तुम क्यों रो रही हो ? 
रोते-रोते वह बोली अभी थोड़ी देर पहले इन्होने मुझसे खीर बनाने के लिए कहा था। लेकिन मेने जैसे ही खीर बनाई ये मर गए। 

वह मित्र सब कुछ जानता था। समझ गया। यह सब बहाना है। उसे डर था कि में खीर ना खा जाऊ। 


यह सोचकर वह मित्र भी हाय मित्र हाय मित्र कहकर विलाप करने लगा। उनकी आवाज सुनकर पास पड़ोस के और भी लोग वहां आ गए। सेठ जी की मौत का समाचार सुनकर सब उन्हें श्मशान ले जाने का इंतजाम करने लगे। 

उस समय उसकी पत्नी ने रोते-रोते उसके कान के पास मुँह ले जाकर कहा अब तुम उठ जाओ नहीं तो यह लोग तुम्हे श्मशान ले जायेंगे और जला डालेंगे। 

कंजूस सेठ ने उसी तरह उत्तर दिया नहीं जब तक मेरा यह मित्र यहाँ से नहीं चला जायेगा तब तक में नहीं उठूंगा। यह मेरी खीर खाना चाहता है। में उसे ऐसा नहीं करने दूंगा। 

वह उसी तरह लेटा रहा। पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने अर्थी तैयार की और श्मशान ले गए। चिता पर रखा लेकिन कंजूस सेठ तब भी नहीं उठा। जब आग उसको जला रही थी तब भी उसने मुख से एक शब्द नहीं निकाला। अंत में वह जलकर राख हो गया। 

Moral of the story

इस प्रकार उस आदर्श कंजूस ने जरा सी खीर के लिए अपने प्राणो का बलिदान कर दिया। इसके मरने के बाद उसके धन को दुसरो ने खूब भोगा। 

दोस्तो यह Funny Story वाकई में मुझे लाजवाब लगी मुझे।


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2. Moral Stories in Hindi - तीन मछलियों की हिंदी कहानी 


एक बहुत सुंदर बन था। उसमे वैसा ही एक सुंदर तालाब था। उस तालाब में तीन मछलियाँ रहती थी। तीनो के स्वभाव अलग-अलग थे। पहली के सामने कोई समस्या आती तो वह तुरंत उसे सुलझाने की कोशिश करती, किसी की राह नहीं देखती थी।

दूसरी मछली भी होशियार थी पर वह तुरंत ही कुछ करने में विश्वाश नहीं करती थी। वह सोचती थी समय पर जैसा होगा वैसा कर लिया जायेगा। अभी से क्यों परेशान हुआ जाए !


तीसरी मछली कुछ भी नहीं सोचती थी। वह तो मानती थी कि जो भगवान को मंजूर होगा, वही होगा !

एक दिन उन्होंने कही मछेरो को जाते देखा। वे आपस में बात कर रहे थे की इस तालाब में बहुत अच्छी मछलियाँ है। उन्हें पकड़ना चाहिए। 
पहली मछली यह सुनते ही जल की बहती धारा के साथ दूसरे तालाब में चली गई। 


दूसरी मछली ने भी मछुओं की बाते सुनी और सोचा पहले इन्हे आने दो तब जैसा ठीक होगा वैसा कर लुंगी। 

सुना तीसरी मछली ने भी लेकिन उसने कोई चिंता नहीं की। जो होना है वह तो होगा ही ! उसे कौन रोक सकता है ?

Moral Of The Story

जैसा की हो सकता था वे मछुए दूसरे दिन ही जाल लेकर आ पहुंचे। दूसरी मछली जाल को देखते ही ऐसे लेटी जैसे मर गई। मछुओं ने उसे देखकर सचमुच मरी हुई समझ ली और उठाकर एक तरफ फेंक दिया। बस उसे मौका मिल गया वह भी मौका देख के बहती जल धारा में कूद गई और दूसरे तालाब में पहुँच गई। तीसरी मछली ने न तो कुछ सोचा न कुछ किया। वह जाल में फंस गई और तड़प-तड़प कर मर गई। 


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3. Moral Stories in Hindi - लालची बगुला 


एक था तालाब। उसमे बहुत-सी मछलियाँ रहती थी। वही एक बगुला भी रहता था। वे मछलियां उस बगुले से बहुत डरती थी और उससे दूर-दूर रहती थी। 

बगुले ने सोचा यह तो बड़ी खराब बात है इन मछलियों को किसी भी तरह जाल में फंसना चाहिए। सोचते-सोचते उसे एक तरकीब सूझी। वह मछलियों के पास पहुंचा और उनसे बोला मेने एक बहुत बुरी खबर सुनी है। एक मछेरा जाल लेकर इधर ही आ रहा है। मेने उसे देखा है। वह तुम सबको जाल में फंसाकर मार डालेगा, और खा जायेगा। 

मछलियाँ उस बगुले का विश्वाश तो नहीं करती थी, लेकिन मछेरा से वे बहुत डरती थी। उन्होंने बगुले से पूछा हमे अब क्या करना चाहिए ?
बगुला बड़े गंभीर स्वर में बोला अगर तुमको मुझ पर विश्वाश हो तो में एक रास्ता जानता हूँ। पास के घने बन में कुछ दुरी पर एक तालाब है। उसका जल अमृत जैसा है। मछेरो को उस तालाब के बारे में कुछ पता नहीं। तुम चाहो तो में एक-एक करके तुम सबको वहां पहुंचा दूंगा। 

मछलियाँ तो बहुत बुरी तरह डर गई थी। इसलिए उनकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी। उन्होंने कहा हमे तुम पर पूरा विश्वाश है। कृपा कर तुम हमे उस तालाब पर ले चलो। 

यह सुनकर बगुला मन-ही-मन बहुत खुश हुआ और वह बारी-बारी से एक-एक मछली को उस झूठ-मुठ के तालाब पर ले जाता और मार कर खा जाता। 

उस तालाब में एक मगरमच्छ भी रहता था। बगुला इन मछलियों को कहाँ ले जाता है, यह जानने के लिए उसने पूछा, तुम इन मछलियों को कहाँ ले जाते हो ? 


बगुले ने मगर को वही कहानी सुना दी जो मछलियो को सुनाई थी। मगर था तो ताकतवर लेकिन मछेरो के जाल से वो भी डरता था। उसने बगुले से कहा मुझे भी तुम उस तालाब पर पहुंचा दो। 

बगुला बहुत खुश हुआ और अगले दिन मगर को साथ लेकर उसी स्थान पर पहुंचा जहाँ वह मछलियों को मार कर खाया करता था। 

मगर उस स्थान को देखते ही सब कुछ समझ गया। यह बगुला बहुत मक्कार है। मछलियों को यहाँ लाकर खा जाता है। मुझे भी इसी तरह मार डालेगा। 

Moral Of The Story

लेकिन वह मगर मछलियों जैसा डरपोक नहीं था। उसने सोचना शुरू किया, अरे में तो मगर हूँ। में उस बगुले से डर जाऊंगा। नहीं, नहीं। 
यह सोचते-सोचते मगर ने बगुले का गला पकड़ लिया और उसे मार डाला। वापस लौटकर बची हुई मछलियों को सारी कहानी सुनाई। बगुले की दुष्टता की बात सुनकर उन्हें बहुत दुःख हुआ पर उनकी जान बच गई। 

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4. Moral Stories in Hindi - अशर्फियों का चोर 


प्राचीन काल में एक नगरी थी, उसका नाम था - श्रावस्ती। वहां प्रसेनजित नाम का एक राजा राज करता था। उसी नगरी में किसी दूसरे देश का एक ब्राह्मण भी अपने मित्र के घर में रहता था। उसे खूब पैसा मिलता था और वह उन पैसो को जोड़ा करता था। 

इस तरह उसने दो हजार अशर्फियाँ जोड़ ली। फिर उनको पास के जंगल में एक पेड़ के निचे गाड़ दिया। घर में रखता तो चोरो के चुरा ले जाने का डर था। बैंक तब थे नहीं। लेकिन उसका मन अब भी शांत नहीं हुआ। उसे बराबर यह शंका रहती थी, कि कहीं कोई उन अशर्फियों को वहां से भी खोद कर न ले जाए। 

और सचमुच एक दिन ऐसा हो गया। वह रोज उन अशर्फियों को देखने जाया करता था। उस दिन भी गया लेकिन क्या देखा कि किसी ने उस स्थान को खोद डाला है और अशर्फियाँ निकाल ली है। अब तो जैसे उसके प्राण ही निकल गए। उसे बहुत दुःख हुआ। उसने सोचा अब जी के क्या होगा। इससे तो मर जाना अच्छा है। लेकिन मरना भी क्या आसान है ! अब करे तो क्या करे ? 

इसी उधेड़-बुन में एक दिन उसने इस बात की चर्चा अपने मित्र से की। उसके बाद वह कहानी एक कान से दूसरे कान, दूसरे कान से तीसरे कान से होती हुई राजा के पास पहुँच गई। सुनकर राजा को भी बहुत दुःख हुआ। उसने ब्राह्मण को बुलाकर पूछा, तुमने किस पेड़ की जड़ में अशर्फियाँ छिपाई थी ?  

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, महाराज मैने नागबला के पेड़ के नीचे अपनी अशर्फियाँ गाड़ी थी। 


राजा ने सुना, एक मिनट सोचा, फिर कहा तुम चिंता मत करो मै पता लगाकर छोडूंगा कि किसने तुम्हारी अशर्फियाँ चुरायी है और अगर पता नहीं लगा पाया तो अपने खजाने से तुम्हे दो हजार अशर्फियाँ दूंगा। 
यह सुनकर ब्राह्मण बहुत खुश हुआ। उसने राजा को आशीर्वाद दिया और चला गया। 

राजा बहुत बुद्धिमान था। सोचते-सोचते उसके मन में एक विचार उठा। उसने मंत्री को बुलाकर कहा मेरे सिर में बहुत तेज दर्द रहने लगा है किसी अच्छे वैद्य को बुलाओ। 

बस फिर क्या था ? वैद्य पर वैद्य राजा का इलाज करने लगे। राजा हर वैद्य से एक सवाल जरूर पूछता ''आजकल तुम्हारे पास कितने मरीज आते है उन्हें क्या-क्या दवा देते हो ? 

सभी वैद्य राजा को खुश करने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर जवाब देते थे। एक दिन एक वैद्य ने राजा के इसी प्रशन के उत्तर में, निवेदन किया, में अपने रोगी को नागबला को दवा के रूप में प्रयोग करने के लिए कहता हूँ। 

फिर राजा ने पूछा तुम्हारे उस रोगी का नाम क्या है ?
वैद्य ने कहा, महाराज उसका नाम मातृदत है। 
वैद्य के जाने के बाद महाराज ने मंत्री को बुलाया और कहा जैसे भी हो मातृदत को बुलावा भेजो। 

मातृदत तो उसी शहर में रहता था। उसे ढूंढने में क्या  कठिनाईं होती ? थोड़ी ही देर में मातृदत को राजा के सामने पेश कर दिया गया। 
राजा ने पूछा क्या तुम नागबला का प्रयोग करते हो ?

मातृदत ने उत्तर दिया जी महाराज वैद्य जी ने मुझे वही दवा लेने को कहा है। 


राजा ने फिर पूछा तुम्हारे लिए नागबला कौन लाता है ? 
मातृदत ने उत्तर दिया महाराज मेरा नौकर मेरे लिए नागबला लाता है। 
तब राजा ने कहा तुम अपने नौकर को तुरंत मेरे पास भेज दो में उससे मिलना चाहता हूँ। 

नौकर ऊपर से बहुत प्रसन्न था पर न जाने क्यों, अंदर ही अंदर डर भी रहा था। 

राजा ने उससे पूछा क्या तुम अपने स्वामी के लिए नागबला लाते हो ?
नौकर ने हाथ जोड़कर और सर झुकाकर कहा हां महाराज में ही लता हूँ। 

Moral of the story

तब राजा बोले हमे मालूम हुआ, तुम्हे नागबला की जड़ से दो हजार अशर्फियाँ मिली है। वे अशर्फियाँ एक ब्राह्मण की है। जाओ और उन्हें ब्राह्मण देवता को सौंप दो। 

नौकर क्या कर सकता था ! वह अशर्फिया ले आया और उन्हें ब्राह्मण को सौंप दिया। ब्राह्मण राजा की चालाकी से बहुत प्रसन्न हुआ। 


5. Moral Stories in Hindi - भाग्य का खेल 

हुत समय पहले की बात है। किसी नगर में किशन नामक एक भिखारी रहता था। सुबह होते ही अपना चोगा और कटोरा तैयार करता और भीख मांगने निकल पड़ता था। वह हर दरवाजे पर जाकर एक ही टेर लगाता-

''देने वाला श्री भगवान 
हम सब है उसकी संतान'' 

उसे जो कुछ भी मिल जाता वह उसी से संतुष्ट हो जाता। उसका एक मित्र जगन्नाथ भी भीख मांगता था। वह दरवाजे पर जाकर हाँक लगाता-

''देने वाला महाराज 
वही दिलाएगा भोजन आज'' 

किशन और जगन्नाथ भीख मांगने के लिए राजा के महल में भी जाते थे। राजा प्राय दोनों की आवाज सुनता था उन दोनों को भीख देता था किन्तु वह जानना चाहता था किसकी बात सच है ? इंसान को सब कुछ देना, भगवान के हाथ में है या फिर राजा के हाथ में है ?

एक दिन राजा ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक बड़ा सा पपीता लिया। उसका एक टुकड़ा काटकर उसके भीतर सोने के सिक्के भर दिए। टुकड़े को जो का त्यों जोड़ दिया। तभी किशन भीख मांगने आ पहुंचा। 

राजा ने उसे दाल-चावल दिलाकर विदा किया। जगन्नाथ खंजड़ी बजाता आया और टेर लगाई-

''देने वाला है महाराज 
वही दिलाएगा भोजन आज'' 


राजा ने सिक्को से भरा हुआ वह पपीता उसके हवाले कर दिया। जगन्नाथ ने वह पपीता दो आने में एक सब्जी की दुकान पर बेच दिया। पेसो से उसने उस दिन भोजन का जुगाड़ कर लिया। 

थोड़ी देर बाद किशन सब्जी वाले की दुकान के आगे से निकला। उसने मीठी आवाज में अपनी बात दोहराई। सब्जी वाले ने वह पपीता किशन को दे दिया। कृपाल उसे दुआए देता हुआ घर लोट आया। 

घर आकर उसने पपीता काटा तो सिक्के देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया। उसने तुरंत सिक्के उठाये और सब्जी वाले के पास पहुँच गया। उन सिक्को को देकर कहा,भाई यह तुम्हारे पपीते में से निकले है। इन पैसो से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।

सब्जी वाला भी ईमानदार था। वह बोला यह पपीता तो मुझे जगन्नाथ ने दिया था। तब तो यह सिक्के भी जगन्नाथ के ही है। जगन्नाथ ने सिक्के देखकर कहा ये तो राजा के है। वह पपीता मुझे भीख में राजा ने दिया था। 

Moral of the story

राजा तीनो व्यक्तियों और सिक्को को देखकर हैरान रह गया। सारी कहानी सुनकर उन्हें यकीन हो गया कि इंसान को भगवान पर ही भरोसा करना चाहिए। वही सबको देने वाला है। राजा ने तीनो को भोजन कराया और उपहार देकर विदा किया। 


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6. Moral Stories in Hindi - संगीतकार की कहानी 


एक संगीताचार्य थे। उनके पास एक आदमी संगीत में निपुणता प्राप्त करने की इच्छा से आया और उनसे बोला, आप संगीत के महान आचार्य है और संगीत कला प्राप्त करने में मेरी गहरी रूचि है। 


इसलिए आप से निवेदन है कि आप मुझे संगीत की शिक्षा प्रदान करने की कृपा करे। संगीताचार्य ने जवाब दिया, जब तुम्हारी इतनी उत्कृष्ट इच्छा है, मुझसे संगीत सीखने की तो मेरे घर आ जाओ में सीखा दूंगा। उस आदमी ने आचार्य से पूछा कि इस कार्य के बदले उसे क्या सेवा करनी होगी। आचार्य ने कहा कुछ खाश नहीं मात्र सौ स्वर्ण मुद्राये देनी होगी। 


सौ स्वर्ण मुद्राये है तो बहुत ज्यादा और मुझे संगीत का थोड़ा बहुत ज्ञान भी है पर ठीक है में सौ स्वर्ण मुद्राये आपकी सेवा में प्रस्तुत कर दूंगा। उस आदमी ने कहा इस बात पर आचार्य ने जवाब दिया यदि तुम्हे संगीत का पहले से थोड़ा बहुत ज्ञान है तब तो तुम्हे दो सौ स्वर्ण मुद्राये देनी होगी। जिज्ञासु ने हैरानी से पूछा, आचार्य यह बात तो हिसाब-किताब के अनुकूल नहीं है। 

Moral of the story

मेरी समझ से भी एक दम परे है। काम कम करने पर कीमत ज्यादा ? आचार्य ने उत्तर दिया, काम कम कहाँ है ? पहले तुमने जो सीखा है उसे मिटाना है, उसे भूलाना होगा तब फिर नए सिरे से सीखना प्रारम्भ करना पड़ेगा। क्योकि पहले से भरे हुए पात्र में कुछ भी और डालना असम्भव है। जिज्ञासु सब कुछ समझ गया। 

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8. Moral Stories in Hindi - जंगलराज 


एक जंगल के जलकुंड पर एक मेमना पानी पी रहा था। अभी उसने पानी पिया ही नहीं इतने में एक चिता उधर आया। मेमने को देखकर चीते के मुँह में पानी आ गया। उसने सोचा कैसे न कैसे इस मेमने को ग्रास बनाया जाए। चिता मेमने के पास आया। मेमने ने चीते से राम-राम की। 


चीते ने गुर्राते हुए कहा, वाह आज तुम बच नहीं पाओगे। में तो तुम्हे खाऊंगा। मेमने ने कातर स्वर में कहा, जंगल के राजा ! मेरा क्या कसूर है उसे बताने की कृपा करे। तुमने मुझे एक साल पहले गाली दी थी चीते ने जवाब दिया। मेमना बोला, वनराज ! 

में तो अभी छह महीने का हूँ। चीते ने कहा, तब तुम्हारे बाप ने दी होगी मुझे गाली। मेमने ने कहा, मेरे पिता मेरे जन्म के पहले ही एक लकड़बग्घे के हाथो मारे गए। 

चीते ने पलटकर जवाब दिया, कोई बात नहीं तुम्हारी माँ ने गाली दी होगी। मेमने ने कहा, मेरी माँ तो इस जंगल में कभी आई ही नहीं। मेरी माँ तो गड़रिये के बाड़े में बंधी रहती है। 

Moral of the story

चीते ने पलटवार किया, फिर भी तुम नहीं बच सकते। मुझे एक भेड़ ने गाली दी थी तुम भेड़ के जाये-जन्मे, इसलिए तुम्हारे जाति भाई की सजा तुम्हे भुगतनी होगी। यही जंगलराज का कानून है। मेमना मिमियाता रह गया और चीते ने उसे काल का कवल ( कौर ) बना दिया। 

9. Moral Stories in Hindi - बोली का घाव


एक जंगल में एक शेर रहता था। वह अपने आप में मस्त रहता। किसी को बेवजह तंग नहीं करता। जंगल से कुछ दुरी पर एक कस्बा था। उस कस्बे में एक लकड़हारा रहता था। 


जंगल में शेर के भय से किसी के जाने की हिम्मत नहीं होती थी। लकड़हारे ने एक दिन हिम्मत की और जंगल में लकड़ी काटने पहुँच गया। लकसी काटने की आवाज शेर के कानो में पड़ी। वह चौकन्ना हुआ। 

आदमी से उसे भी डर लगता था। वह लकड़हारे के पास पहुँचा। शेर को सामने देख लकड़हारा थर-थर काँपने लगा। उसे साक्षात् मौत सामने दिखाई दे रही थी। शेर ने चेतावनी देते हुए कहा ''अगर तुम्हे अपनी जान प्यारी है तो दुबारा इस जंगल में दिखाई मत देना। 

लकड़हारे ने गिड़गिड़ा कर कहा, वनराज में गरीब आदमी हूँ। कोई और धंधा है नहीं ! बाल बच्चे भूखे मर जायेंगे। कहते हुए लकड़हारा फफक कर रो पड़ा। शेर को लकड़हारे की दशा पर तरस आ गया। उसने कहा ठीक है हरे पेड़ो को हाथ मत लगाना। सुखी लकड़ियाँ ही काटना तथा किसी और से कुछ न कहना। 

ठीक है हुजूर ! अब तो लकड़हारा रोज आता और गट्ठर बांधकर कस्बे में ले जाता। लकड़ी का धंधा अच्छा चल निकला। लकड़हारे का गुजारा हो रहा था। 



कस्बे के लोग आश्चर्य करते कि लकड़हारा उस जंगल से कैसे लकड़ियाँ काट लाता है जहाँ शेर रहता है। बहुत से लोग उससे पूछते। मगर वह टाल जाता। कोई कहता लकड़हारा सचमुच बहादुर है ! कोई कहता ऐसा साहसी आदमी तो आस-पास कही नहीं मिलेगा। 

सुनकर लकड़हारा फूला न समाता। उसे अब अपने आप पर घमंड होने लगा था। एक दिन एक ग्राहक ने लकड़ी खरीदते वक्त उससे पूछा तुम बड़े बहादुर हो, तुम उस जंगल से कैसे लकड़ियाँ काट लाते हो, जिसमे शेर रहता है। लकड़हारा कई दिनों से अपनी प्रशंसा सुन रहा था। बड़े घमंड से बोला अरे वह भी कोई शेर है गीदड़ है गीदड़ ! डरता है मुझसे। 


कहते है दीवारों के भी कान होते है। इस कहावत को लकड़हारा भूल गया शायद। किसी तरह यह बात शेर के कानो में पहुँच गई। शेर गुस्से में दहाड़ा। जंगल के जीव डरकर भागने लगे। पेड़ो के पक्षी उड़ गए। सभी ने सोचा आज किसकी सामत आई है। जंगल के जानवरो और पक्षियों में खुसुर-फुसुर होने लगी। 

दूसरे दिन लकड़हारा तो अपनी धुन में जंगल पहुंचा। जैसे ही उसने अपनी कुल्हाड़ी सूखे हुए पेड़ पर चलाई, सामने शेर को देखकर सकते में आ गया। शेर की आँखे गुस्से से अंगारे सी दहक रही थी। नथुने फड़क रहे थे। शेर को गुस्से में देखकर लकड़हारे की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे रह गई।  

वह कुछ समझ पाता इससे पहले शेर ने गुस्से में एक दहाड़ मारी। लकड़हारा डर के मारे काँपने लगा। वह शेर के पेरो में गिर पड़ा। बोला, हुजूर कुछ गलती हो गई हो तो माफ कर दो। शेर को लकड़हारे की दशा पर तरस भी आ रहा था। 

वह लकड़हारे से बोला ''जिस थाली में कहते हो उसी में छेद करते हो ! क्या कहा था तुमने कस्बे में जाकर ?

हुजूर गलती हो गई। लकड़हारे ने प्राणो की भीख मांगते हुए कहा। अच्छा.......! शेर ने व्यंग्य कसते हुए कहा, में कायर हूँ, गीदड़ हूँ, और तुम बहादुर हो। लकड़हारा समझ गया कि बस वह कुछ ही पलो का मेहमान है। 

उसने शेर से विनती की, हुजूर अबकी बार माफ कर दो। आइंदा ऐसा नहीं होगा। ठीक है अपनी कुल्हाड़ी उठाओ। शेर ने लकड़हारे से कहा। लकड़हारे ने डरते-डरते अपनी कुल्हाड़ी उठाई। 

शेर ने फिर कहा इसे मेरी पीठ पर मारो। अब तो लकड़हारा और भी डर गया। उसमे इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह कुल्हाड़ी से शेर की पीठ पर वार करे। उसने ऐसा करने से मना कर दिया। शेर ने लकड़हारे को समझाया, डरने की कोई बात नहीं है। जैसा में कहता हूँ वैसा करो। वरना.........! शेर ने फिर चेतावनी के स्वर में कहा। 

मरता क्या न करता। लकड़हारे ने शेर के आदेशानुसार कुल्हाड़ी का एक वार डरते-डरते शेर की पीठ पर किया। कुल्हाड़ी शेर की पीठ में गड़ गई। खून की धारा बह निकली। लेकिन शेर ने उफ तक नहीं की। उसने लकड़हारे से कहा, ठीक एक सप्ताह बाद मुझसे मिलना, यही इसी जगह और इसी वक्त ! लकड़हारे ने डरते-डरते हाथ जोड़ते हुए विदा ली। 

ठीक एक सप्ताह बाद लकड़हारा डरते-डरते शेर द्वारा तय स्थान पर पहुँचा। वनराज उसी का इंतजार कर रहा था। आते ही उसने लकड़हारे से अपनी पीठ का घाव बताया। पूछा, कुल्हाड़ी के वार से हुए घाव का एक सप्ताह हुआ है। क्या यह भर गया है ? लकड़हारे ने कहा, जी हुजूर बिलकुल भर गया, निशान तक नहीं है। शेर ने कहा, देखा तुम्हारी कुल्हाड़ी से हुआ घाव भर गया लेकिन तुम्हारी बोली का घाव अभी तक हरा है। 

Moral of the story

कटु और कड़वी बोली का घाव दिल पर होता है, जो कभी नहीं भरता, जबकि हथियारों से उत्पन्न घाव कुछ दिन बाद भर जाते है। मेने तो तुम्हे क्षमा कर दिया। भविष्य में इस सीख को याद रखना। फिर कभी ऐसी गलती मत करना। बोली में ही सब कुछ है। बोली ही अमृत है और बोली ही जहर है। जाओ अपना गुजर-बसर करो ! यह कहकर शेर जंगल में गायब हो गया। लकड़हारा सब कुछ समझ गया। 


10. Moral Stories in Hindi - ईमानदार राजा की कहानी


राजा विक्रम अपनी न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वो अपने लिए महल बनवा रहे थे। राजमहल का नक्शा तैयार हो चूका था। पर एक समस्या आड़े आ रही थी। राजमहल के निर्माण-स्थान के पास ही एक झोपडी थी। इस झोपडी के कारण राजमहल की शोभा प्रभावित हो रही थी। 


राजा ने झोपडी के मालिक को बुलवाया। उन्होंने अपनी समस्या के बारे में झोपडी के मालिक को बताया और झोपडी के बदले मोती रकम देने का प्रस्ताव उसके सामने रखा। पर झोपडी का मालिक बहुत स्वाभिमानी था।

उसने राजा से कहा महाराज माफ करे आपका प्रस्ताव मुझे मंजूर नहीं है। अपनी झोपडी मुझे जान से भी ज्यादा प्यारी है। इसी झोपडी में मेरा जन्म हुआ, मेरे बच्चे बड़े हुए, मेरी पूरी उम्र इसी में गुजर गई। में अपनी इसी झोपडी में मरना भी चाहता हूँ। 

Moral of the story

राजा ने सोचा इस गरीब के साथ ज्यादती करना उचित नहीं है। उसने अपने मंत्री से कहा ''कोई हर्ज नहीं'' इस झोपडी को यही रहने दो। जब लोग इस शानदार महल को देखेंगे तो वे मेरे सौन्दर्यबोध की सराहना अवश्य करेंगे। जब वे राजमहल के समीप इस झोपडी को देखेंगे तो मेरी न्यायप्रियता, सह्रदयता और दया भाव की भी तारीफ करेंगे।  


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11. Moral Stories in Hindi - मोहिनी की मार 

किसी गांव में सीधे-सरल पंडित-पंडिताइन रहते थे,जिनकी गुजर-बसर बड़ी मुश्किल से होती थी। किसी ने पंडित जी को पूजा-पाठ के लिए बुला लिया तो दक्षिणा से दिन निकल गया, नहीं तो राम भरोसे नैया थी। श्राद्व पक्ष आया तो पंडिताइन ने कहा, तुम लोगो का श्राद्व करवाते फिरते हो। धन के संकट के कारण में सदा अपना मन मसोस कर रह जाती हूँ। मेरी बड़ी इच्छा है कि हम भी अपने पूर्वजो का श्राद्व भली भाँति करे। 

कुछ जमा हो तब ना........! कुछ भी हो, इस बार श्राद्व जरूर करना है। चाहो तो बैल बेच दो। पंडित जी बैल लेकर निकल पड़े। पंडिताइन ने समझाया, देखो सौ रूपये से कम में मत बेचना। अगर सौ में सौदा ना पटे तो नब्बे, सत्तर से तो कम किसी हालत में नहीं। 

रास्ते में एक बकरी चराने वाले ने पूछा, क्यों भाई, बैल लेकर कहाँ जा रहे हो ? बेचने जा रहा हूँ। बकरी वाला वास्तव में एक ठग था। बात बनाते बोला, बैल की जरूरत तो मुझे भी है, चाहो तो मुझे बेच दो। पंडित बोला सौ रूपये लूंगा। सौ रूपये तो बहुत अधिक है ठग बोला।

बैल के दाम किसी दूसरे आदमी से तय करवाना चाहिए। सामने पहाड़ी पर एक बूढ़ा बैठा है। चलो उसी से पूछते है। ठग ने पासा फेंका। बूढ़े ने बैल को घूम-घूम के देखा और गर्दन हिलात बोला यह तो एक दम बूढ़ा बैल है.....! चार रूपये से ज्यादा इसकी कीमत नहीं। भोले पंडित जी हैरान तो हुए पर बूढ़ा भला बैल की कीमत क्यों गलत बातयेगा। 

जरूर बाजार में इसकी कीमत चार रूपये ही होगी, ऐसा सोचकर पंडित जी ने अपना बैल चार रूपये में बेच दिया। घरवाली ने माथा ठोक लिया। कहने लगी, तुम तो बुदू ही रहोगे। ठगो ने मिलकर तुम्हे लूट लिया और तुम आराम से घर चले आये। अब तुमको इसका बदला जरूर लेना चाहिए। पंडिताइन ने पंडित जी को सारी योजना समझा दी।

एक मोहिनी स्त्री का वेश बना पंडित जी उसी स्थान पर पहुंचे। ठग भी शिकार की तलाश में वही घूम रहा था। स्त्री को देख ठग बोला, कहाँ जाने का विचार है ? स्त्री की आवाज बनाते पंडित जी ने कहा, मोहिनी तो घर ही छोड़ आई है....! रह लेगी कही भी। ठग बोला मेरा घर पास ही है मोहिनी, वही चलो। 


पंडित जी ठग के साथ चल दिए। वहाँ बैल की कीमत निश्चित करने वाला बूढ़ा भी बैठा था। ठग ने कहा, बाबा देखो में किसे लेकर आया हूँ। स्त्री को देख बूढ़ा खुश हो गया। कहने लगा, बेटा में इससे विवाह कर लेता हूँ। बेटा मान गया। 

स्त्री को वहीं छोड़ कर वह किसी दूसरे मुर्ख की तलाश में चला गया। उधर बूढ़े ने स्त्री पर अपना प्रभाव जमाने के लिए ठगी से बटोरी गई धन-दौलत दिखानी शुरू कर की। पंडित जी ने अचानक वही से एक डंडा उठाया और बूढ़े को पीटना शुरू कर दिया। अरे..... अरे.....अरे यह क्या कर रही हो......मोहिनी ? 

Moral of the story

हैरान बूढ़ा दर्द से बिलबिलाते चिलाया। लोगो का धन लिया खूब डकार अब खा मोहिनी की मार ! चार डंडो ने ही बूढ़े के होश उदा दिय। वह वही गिर पड़ा। पंडित जी ने बैल की कीमत के सौ रूपये लिए और घर आ गए। पंडिताइन प्रसन्न हुई। बड़े उत्साह से श्राद्व की तैयारी में झूठ गई।   

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12. Moral Stories in Hindi - बोली का कमाल 


दो बहने थी, संतो और बंतो। साथ खेलती, साथ खाती, कभी झगड़ती, फिर रूठती-मनाती और रात को एक दूसरी के गले में बाहे डालकर सो जाती थी। देखते देखते दोनों बड़ी हो गयी। संतो बड़ी थी , सो उसका विवाह पास के गांव के मुखिया खड़कसिंह से हो गया। संतो चली गई तो बंतो अकेली रह गई। वह संतो को याद कर-कर रोती। 

संतो तो अपनी घर गृहस्थी में मगन हो गई, पर बंतो की बाते उसे भी याद आती। एक दिन माँ ने बंतो से कहा, बहन को इतना याद करती है, जा कुछ दिन उसके पास रह आ। बंतो खुशी-खुशी संतो की ससुराल पहुंची। उसे संतो के यहाँ बड़ा अच्छा लगा। पर जाने क्यों वह खड़कसिंह को देखती, उसे कुछ अजीब सा लगता था। 

उसकी बड़ी-बड़ी मूँछ, तगड़ी सी पगड़ी और कमर में कतार देखकर वह सहम जाती। जीजा ने भी उससे कभी हंस कर बात नहीं की थी। एक बार खड़कसिंह चौपाल पर बैठकर गांव के लोगो से बतिया रहा था। घर में संतो भोजन के लिए उसका इंतजार कर रही थी। 

बहुत देर हो गई तो संतो ने बंतो से कहा, जा बंतो अपने जीजा को बुला ला। मुखिया क्या बने, उन्हें खाने-पिने का होश ही नहीं रहता। बंतो जैसी थी, वैसी भागी गई और चौपाल पर जाकर बोली :-

 ''दिन भर बातो-गप्पो की धुन 
  नहीं लेते घर की सुध-बुध 
  खाना है तो घर आओ 
  नहीं तो भाड़ में जाओ'' 

साली की ऐसी बात सुन खड़कसिंह को बड़ा बुरा लगा। वह रोब से बोला :-

''ना बाल सँवारे ना पाँव में जूती, भागी चली आई,
 तनिक शर्म ना आई'' 

बंतो रोते-रोते घर पहुँची और सारी बात बताई। तब संतो ने कहा, तुम्हारे जीजा गांव के मुखिया है। उसे तेरा ऐसे बोलना, वह भी इतने लोगो के बीच, नहीं सुहाया। अबकी बार जैसे में कहती हूँ, वैसे बुलाना, कहकर बंतो के कण में कुछ कहा। बंतो दुबारा सजसंवर कर गई और बोली। 

''सिर पर पगड़ी लटके कमर कटार 
 राजा जैसे जीजा मेरे, भोजन है तैयार"

अपनी साली की मीठी बाते सुनकर खड़कसिंह खुशी-खुशी बंतो के साथ चल दिया। 

Moral of the story


शिक्षा :- प्यार से कुछ भी बोले तो मनुष्य करने के लिए तैयार हो जाता है।


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