धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की एक प्रेरणादायक कहानी - Prernadayak kahani

नमस्कार दोस्तों जिंदगी में बेईमानी करना आजकल ट्रेंड सा हो गया।  Bestbookshindi.in की एक ओर Prernadayak kahani
जो आजकल के भाईचारे को प्रकट करने की कोशिश कर रही है। दोस्तों यदि आप बेस्ट बुक्स के रेगुलर विजिटर है तो आपको पता होगा यहाँ पर हिंदी कहानियो से आप बहुत कुछ सीखते आ रहे है और आज की पोस्ट में आजकल भाइयो में कैसे लड़ाइयां हो सकती है उसे हम इस मोरल कहानी में सिखने का लुप्त उठाएंगे। तो कहानी को पढ़ना शुरू करते है 

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धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की एक प्रेरणादायक कहानी - Prernadayak Kahnai


बहुत पुरानी बात है मित्रो ! हजारो साल पुरानी बात है, उसमे दो भाई रहते थे। दोनों का स्वभाव इतना अलग था कि एक का नाम पड़ गया था - धर्मबुद्धि और दूसरे का दुष्टबुद्धि। 

जैसा कि उन दिनों में होता था, वे धन कमाने के लिए प्रदेश गए। उन दिनों में प्रदेश को दिशावर भी कहते थे। दोनों भाइयो ने प्रदेश में रहकर बड़ी मेहनत से कार्य किया और दो हजार अशर्पियाँ कमाई। 

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जब वे घर लोट रहे थे तो अपने घर के पास आकर उन्होंने आपस में सलाह की और एक हजार अशर्पियाँ एक पेड़ के नीचे गाड़ दीं। दोनों ने आपस में सलाह कर ली की यदि हमे कोई मुशीबत पड़ी तो यह एक हजार अशर्पियाँ हमारे काम आएगी। बाकि एक हजार अशर्पियाँ दोनों ने आपस में बाँट ली। 

एक दिन दुष्टबुद्धि के मन में एक दुष्ट विचार आया कि क्यों न में वे एक हजार अशर्पियाँ जो पेड़ की जड़ में दबी हुई है निकाल लाऊ। तब तो में बहुत पैसे वाला हों जाऊंगा। 

उसने ऐसा ही किया जाकर उसने छुपके से पूरी अशर्पियाँ निकाल ली और कुछ दिन बाद वह धर्मबुद्धि के पास पहुंचा। भाई चलो अब हम उन अशर्पियों को बाँट लेते है। 

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बेचारे धर्मबुद्धि को इस पर क्या आपत्ति हो सकती थी। अगर तुम ऐसा ही चाहते हो तो चलो हम वही चलते है। 

लेकिन जब वे दोनों वहां पहुंचे और पेड़ की जड़ के नीचे खोदा तो वहां कुछ भी नहीं था। 

धर्मबुद्धि बहुत चकित हुआ लेकिन दुष्टबुद्धि ने तुरंत कहा भाई ये अशर्पियाँ और किसी ने नहीं ली तुम्ही ने निकाली है तुम्हे मेरा आधा भाग देना होगा। 

इस प्रकार दोनों में झगड़ा होने लगा। बात बहुत बढ़ गयी। यहाँ तक कि दुष्टबुद्धि ने अपने भाई धर्मबुद्धि को राजा के दरबार जाने को विवश कर दिया। 

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दोनों राजा के दरबार में पहुंचे 

राजा ने पूछा क्या मामला है ?

दुष्टबुद्धि ने सारी कहानी राजा को सुना दी और अंत में कहा ये अशर्पियाँ धर्मबुद्धि ने ही निकाली है। 

राजा ने कहा यह तुम कैसे कह सकते हो ? कौन गवाह है तुम्हारा ?

दुष्टबुद्धि ने कहा मेरा गवाह वही पेड़ ही है। 

उसकी यह बात सुन राजा और न्यायमंत्री बहुत चकित हुए और बोले अच्छा वह पेड़ तुम्हारा गवाह है तो हम कल सुबह वहां चलेंगे और स्वयं उससे पूछेंगे। 

दोनों भाई राजा का आदेश सुनकर अपने अपने घर गए। 

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धर्मबुद्धि को कोई चिंता नहीं थी। वह मानता था कि धर्म उसके साथ  है जीत उसी की होगी। लेकिन दुष्टबुद्धि ने घर पहुंचकर सारी कहानी अपने पिता को सुना दी और अपने पिता कहा अभी आप जाकर उस पेड़ की खोल में छिप जाओ। सवेरे जब राजा के अधिकारी पूछे तो कहना कि यह अशर्पियाँ धर्मबुद्धि ने ही निकाली है। 

पिता ने ऐसा ही किया वह रात में जाकर खोल में छिप गया। सवेरे जब न्यायमंत्री वहां पहुंचे तो उन्होंने पेड़ से पूछा ''क्या तुम बता सकते हो कि जो एक हजार अशर्पियाँ दोनों भाइयो ने यहाँ गाड़ी थी वे किसने निकाली है ?

पिता ने खोल के अंदर से जवाब दिया ''अशर्पियाँ धर्मबुद्धि ने चुराई है। 

न्याय मंत्रीं यह सुनकर चकित रह गए। सभी सोचने लगे पेड़ तो बोल नहीं सकता तब जरूर कोई खोल के अंदर बैठा होगा। सो उन्होंने आदेश दिया ''इस पेड़ को आग लगा दी जाये''

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आग लगते ही पेड़ की खोल में बैठे दुष्टबुद्धि के पिता कूदकर बाहर आ निकले। लेकिन तब तक वो काफी जल चुके थे बच नहीं सके। 

न्यायमंत्री सब कुछ समझ गए उन्होंने दुष्टबुद्धि को धर्मबुद्धि की अशर्पियाँ लौटाने का आदेश दिया और धर्मबुद्धि को उसकी अशर्पियाँ दिलाई और इतना ही नहीं उन्होंने दुष्टबुद्धि का एक हाथ काटकर देश से निकाल दिया और उसके किये गए छल कपट का दंड दिया। 

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