लव और कुश की लोकप्रिय हिंदी कहानी [ Hindi Kahani ]

Hindi Kahani लव कुश 

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लव और कुश बड़े होनहार बालक थे। उनका जन्म तमसा नदी के किनारे वाल्मीकि आश्रम में हुआ था। वे अपनी माता सीता के साथ इसी आश्रम में रहते थे। बाल्यकाल में स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने उनका पालन-पोषण किया तथा उन्हें सम्पूर्ण विद्याओ का ज्ञान दिया। 

लव-कुश में क्षत्रिय के सभी गुण मौजूद थे। वे शस्त्र चलाना सिख गए थे। बाण चलाने में तो वो बहुत निपुण थे। उनका निशाना अचूक था वे बड़े वीर और साहसी थे। 


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गुरु वाल्मीकि उनको नित्यप्रति रामायण की कथा सुनाया करते थे जिसकी वजह से दोनों बालक रामायण को कंठस्थ कर चुके थे। 

रामायण की कथा का गान करना,गुरु की आज्ञा का पालन करना और मुनि कुमारो के साथ खेलना उनका नित्यकर्म था। 

एक दिन सीता ने आश्रम के बाहर कुछ शोर सुना तो वो दौड़ी हुयी उस तरफ गयी। सीता को रस्ते में ही कुश मिल गया। कुश ने सीता को बताया की आश्रम में एक सुंदर घोडा आया है। उसको हमने पकड़ लिया है और एक पेड़ से बांध दिया है। 


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घोडा किसका घोडा ? यहाँ कैसे आ गया ? चल में भी देख लू। सीता यह सब कहती हुई कुश के साथ उस स्थान पर पहुंची। घोडा सोने के आभूषणों से सज्जित था। उसकी गर्दन में एक स्वर्णपत्र लटक रहा था। 

स्वर्णपत्र पर अंकित था "यह राजा रामचंद्र के अश्वमेध यज्ञ का अश्व है "

यह देखकर सीता घबरा गई और बोली तुम इसे शीघ्र छोड़ दो। 

लव ने कहा हम इसे नहीं छोड़ेंगे यह बहुत सुन्दर है। 

सीता ने कहा बेटे तुम नहीं जानते इसके पीछे सेना होगी। 

कुश बोला कोई भी क्यों ना हो हम इसे नहीं छोड़ेंगे इसे हमने पकड़ा है अब यह हमारा है। 

सीता ने भी दिखाते हुए कहा की अगर तुमने इसे नहीं छोड़ा तो युद्ध होगा। 

हम युद्ध से नहीं डरते लव ने निडर होकर उत्तर दिया। 
हम पुरषार्थी है। आपने ही तो हमे शिक्षा दी थी पुरषार्थी युद्ध से नहीं डरते। फिर आप हमे भय क्यों दिखा रही है। कुश ने लव के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा। 


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सीता धर्म संकट में पड़ गई। वह महर्षि वाल्मीकिजी को भुलाने चली गयी क्या पिता पुत्र में युद्ध होगा सीता अज्ञात अनर्थ की आशंका से सिहर उठी। 

सीता के जाने के बाद एक सैनिक वहां आया। वह लव से बोला "बालक यहाँ अश्वमेध का अश्व तो नहीं आया ना ?

कुश ने उत्तर दिया देखते नहीं वह पेड़ से क्या बंधा है ? सैनिक घोड़े की तरफ बड़ा। लव ने उसे ललकारा घोडा नहीं खोलना। इसे हमने पकड़ लिया है अब यह हमारा है। 

कैसी बाते करते हो बालको यह भी कोई खेल है ? अरे ! यह राजा राम के अश्वमेध यज्ञ का अश्व है। इसे वही पकड़ सकता है जो राम से युद्ध कर सकता है। 
तुरंत कुश ने उत्तर दिया "हमे भय दिखाता है रे" ?

सैनिक को बालको की बाते बालहठ लगी। वह घोडा खोलने के लिए आगे बढ़ा। 
कुश ने कहा देखो सैनिक हम नहीं चाहते कि तुम हमारे बाणों से मारे जाओ। चुपचाप लोट जाओ। पर सैनिक नहीं माना। 


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लव कुश ने युद्ध के लिए ललकारा। सैनिक ने लव-कुश के ऊपर एक बाण छोड़ा। लव ने सैनिक के बाण के दो टुकड़े कर दिए। दोनों और से बाण चलने लगे। अंत में लव-कुश ने सैनिक को हरा दिया। 

उन्होंने सैनिक के दोनों हाथ पीछे की और बांध दिए। फिर उससे कहा जाकर अपने सेनापति से कहो कि सेना लेकर लोट जाये और किसी दूसरे घोड़े का  प्रबंध कर ले। सैनिक चला गया। 

सामने से उन्हें एक विशाल सेना आती हुयी दिखाई दी। लव और कुश सेना को रोकने के लिए चल दिए। आगे आगे रथ पर सेनानायक सवार था। राम ने लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतु को अश्व की रक्षा का भार सौंपा था। वह इस सेना का नायक था। 

लव-कुश को देखकर चंद्रकेतु रथ से उत्तर कर उनके पास गया और बोला तुम इस अष्व को शीघ्र छोड़ दो अथवा मेरे साथ युद्ध करो। 

वीर ! हम वाल्मीकि के शिष्य है हम कायर नहीं है। हम यु ही अश्व को नहीं छोड़ेंगे। हमसे युद्ध करो और छुड़ा लो। साडी सेना मूर्तिवत हो गयी फिर लक्ष्मण सेना लेकर आये और युद्ध करने लगे। इधर सीता महर्षि वाल्मीकि के पास पहुंचकर सारी घटना बता रही थी कि एक तपस्वी आया और हाँपते हुए बोला "महर्षि शीघ्रता कीजिये" 
लव-कुश के बाणो से लक्ष्मण मूर्छित हो गए है। 


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सीता यह सुनते ही व्याकुल हो उठी। महर्षि वाल्मीकि ने मुस्कराते हुए कहा बेटी सीता दुखी मत हो जो कुछ हो रहा है वो शुभ ही है। 

उधर अयोध्या से कुछ दुरी पर विशाल यज्ञ शाला बनी थी। आवश्यक तैयारियां चल रही थी। राम प्रसन्न थे कि अश्वमेध का अश्व बिना किसी रोक टोक के आगे बढ़ रहा था। इतने में ही एक सैनिक घबराता हुआ यज्ञ शाला में आ पहुंचा। 

राम को सादर सिर झुकाकर बोला 
महाराज सारे देश का भर्मण करने के बाद अश्व आयोध्या लोट रहा था तब वाल्मीकि आश्रम के लव और कुश बालको ने उसे पकड़ लिया। हमने उन्हें समझाया लेकिन वे नहीं माने। आखिर युद्ध करना पड़ा। वे साधारण बालक नहीं है महाराज उनके बाणो से हमारे सैनिक और लक्ष्मण मूर्छित हो गए है। 


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यह सुनते ही श्री राम वाल्मीकि आश्रम पहुंचे। वे बालको से बोले मुनि बालको मेरे अश्व को शीघ्र छोड़ दो। पर बालक कहाँ मानने वाले थे। राम से भी युद्ध करने को तैयार हो गए। इतने में ही सीता महर्षि वाल्मीकि को लेकर वहां पहुंची। राम को सामने देखकर वाल्मीकि जी ने कहा लव-कुश तुम मुझसे से सदैव अपने पिता के बारे में पूछते थे ना यही तुम्हारे पिता है अयोध्या के राजा राम। यह सुनकर राजा राम ने लव कुश को बाहों में भर लिया। मिलान के इस अधभुत दृश्य को देखकर वाल्मीकि जी की आँखों से आंसू बह निकले। 





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